कक्षा 12 कवियों का जीवन परिचय

कक्षा 12 कवियों का जीवन परिचय – UP Board के कक्षा 12 के Syllabus में गद्य तथा पद्य में कुल 19 लेखको की जीवनी है। प्रश्न पत्र में कवियों के जीवन परिचय के साथ साथ उनकी कृतियों का भी उल्लेख करना है। जहां कवियों का जीवन परिचय कुल 3 अंक तथा उनकी कृतियाँ 2 अंक में निर्धारित है। कक्षा 12 कवियों का जीवन परिचय कुल 5 अंक का पूछा जाता है। साथ ही साथ लेखकों का जीवन परिचय भी 5 अंक का आता है।

यहाँ केवल पद्य के कवियों की रचनाएँ सहित उनका जीवन परिचय सरल भाषा में दिया जा रहा है। गद्य के लेखकों का जीवन परिचय कृतियों सहित दूसरे पेज पर दिया गया है। जिसके लिए आप यहाँ क्लिक करे – कक्षा 12 लेखकों का जीवन परिचय

कक्षा 12 पद्य खण्ड

कक्षा 12 कवियों का जीवन परिचयकवियों की पाठ्यक्रम में निर्धारित रचनाएँ
भारतेंदु हरिश्चंद्र प्रेम माधुरी, यमुना छवि
जगन्नाथदास रत्नाकर उधो प्रसंग, गंगावतरण
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध पवन दूतिका
मैथिलीशरण गुप्त कैकेई का अनुताप, गीत
जयशंकर प्रसाद गीत, श्रद्धा मनु
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला बादल राम, संध्या सुंदरी
सुमित्रानंदन पंत नौका विहार, परिवर्तन, बापू के प्रति
महादेवी वर्मागीत
रामधारी सिंह दिनकरपुरुरवा, उर्वशी, अभिनय मनुष्य
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेयमैंने आहुति बनकर देखा, हिरोशिमा
कक्षा 12 कवियों का जीवन परिचय

कक्षा 12 कवियों का जीवन परिचय

पद्य के कवियों का जीवन परिचय कृतियों सहित
भारतेंदु हरिश्चंद्र
 
भारतेंदु हरिश्चंद्र
कवि
जन्म
जन्म स्थान
मृत्यू
पिता
सम्मान
जगन्नाथदास रत्नाकर
 
जगन्नाथदास रत्नाकर
कवि
जन्म
जन्म स्थान
मृत्यू
पिता
सम्मान
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
 
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
कवि
जन्म
जन्म स्थान
मृत्यू
पिता
सम्मान
मैथिलीशरण गुप्त
 
मैथिलीशरण गुप्त
कवि, राजनेता, नाटककार, अनुवादक
जन्म

3 अगस्त 1886

जन्म स्थान

चिरगाँव, झाँसी, उत्तर प्रदेश

मृत्यू

दिसम्बर 12, 1964

पिता

सेठ रामचरण

माता

श्रीमती काशीबाई

सम्मान

भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण सम्मान

हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उन्हें साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से सम्बोधित किया जाता था। उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और और इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' की पदवी भी दी थी। उनकी जयन्ती 3 अगस्त को हर वर्ष 'कवि दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

शिक्षा - दीक्षा

विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत, आदि ने उन्हें विद्यालय में पढ़ाया। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। 12 वर्ष की अवस्था में ब्रजभाषा में कनकलता नाम से कविता रचना आरम्भ किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती" में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई।

रचनाए
महाकाव्य
  1. साकेत,
  2. यशोधरा
खण्डकाव्य
  1. जयद्रथ वध,
  2. भारत-भारती,
  3. पंचवटी, द्वापर,
  4. सिद्धराज, नहुष,
  5. अंजलि और अर्घ्य,
  6. अजित,
  7. अर्जन और विसर्जन,
  8. काबा और कर्बला,
  9. किसान,
  10. कुणाल गीत,
  11. गुरु तेग बहादुर,
  12. गुरुकुल ,
  13. जय भारत,
  14. युद्ध, झंकार,
  15. पृथ्वीपुत्र,
  16. वक संहार,
  17. शकुंतला,
  18. विश्व वेदना,
  19. राजा प्रजा,
  20. विष्णुप्रिया,
  21. उर्मिला,
  22. लीला,
  23. प्रदक्षिणा,
  24. दिवोदास,
  25. भूमि-भाग
नाटक
  1. रंग में भंग,
  2. राजा-प्रजा,
  3. वन वैभव,
  4. विकट भट,
  5. विरहिणी,
  6. वैतालिक,
  7. शक्ति,
  8. सैरन्ध्री,
  9. स्वदेश संगीत,
  10. हिड़िम्बा,
  11. हिन्दू,
  12. चंद्रहास
काविताओं का संग्रह

उच्छवास

भाषा शैली

मैथिलीशरण गुप्त की काव्य भाषा खड़ी बोली है। 

शैलियों के निर्वाचन में मैथिलीशरण गुप्त ने विविधता दिखाई, किन्तु प्रधानता प्रबन्धात्मक इतिवृत्तमय शैली की है। उनके अधिकांश काव्य इसी शैली में हैं- 'रंग में भंग', 'जयद्रथ वध', 'नहुष', 'सिद्धराज', 'त्रिपथक', 'साकेत' आदि प्रबंध शैली में हैं। यह शैली दो प्रकार की है- 'खंड काव्यात्मक' तथा 'महाकाव्यात्मक'। साकेत महाकाव्य है तथा शेष सभी काव्य खंड काव्य के अंतर्गत आते हैं।

गुप्त जी की एक शैली विवरण शैली भी है। 'भारत-भारती' और 'हिन्दू' इस शैली में आते हैं। तीसरी शैली 'गीत शैली' है। इसमें गुप्त जी ने नाटकीय प्रणाली का अनुगमन किया है। 'अनघ' इसका उदाहरण है। आत्मोद्गार प्रणाली गुप्त जी की एक और शैली है, जिसमें 'द्वापर' की रचना हुई है। नाटक, गीत, प्रबन्ध, पद्य और गद्य सभी के मिश्रण एक 'मिश्रित शैली' है, जिसमें 'यशोधरा' की रचना हुई है।

जयशंकर प्रसाद
 
जयशंकर प्रसाद
कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार
जन्म

30 जनवरी 1889

जन्म स्थान

वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत

मृत्यू

15 नवंबर 1937

पिता

बाबू देवीप्रसाद

सम्मान

जयशंकर प्रसाद को 'कामायनी' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था।

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के प्रमुख स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं; नाटक लेखन में भारतेन्दु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे जिनके नाटक आज भी पाठक न केवल चाव से पढ़ते हैं, बल्कि उनकी अर्थगर्भिता तथा रंगमंचीय प्रासंगिकता भी दिनानुदिन बढ़ती ही गयी है। इस दृष्टि से उनकी महत्ता पहचानने एवं स्थापित करने में वीरेन्द्र नारायण, शांता गाँधी, सत्येन्द्र तनेजा एवं अब कई दृष्टियों से सबसे बढ़कर महेश आनन्द का प्रशंसनीय ऐतिहासिक योगदान रहा है। इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ की।

शिक्षा - दीक्षा

प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई, किंतु बाद में घर पर इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन इन्होंने किया। दीनबंधु ब्रह्मचारी जैसे विद्वान्‌ इनके संस्कृत के अध्यापक थे। इनके गुरुओं में 'रसमय सिद्ध' की भी चर्चा की जाती है।

घर के वातावरण के कारण साहित्य और कला के प्रति उनमें प्रारंभ से ही रुचि थी और कहा जाता है कि नौ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने 'कलाधर' के नाम से व्रजभाषा में एक सवैया लिखकर 'रसमय सिद्ध' को दिखाया था। उन्होंने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्य शास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था। वे बाग-बगीचे तथा भोजन बनाने के शौकीन थे और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। वे नियमित व्यायाम करनेवाले, सात्विक खान पान एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। वे नागरीप्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष भी थे। क्षय रोग से नवम्बर 14, 1937 (दिन-सोमवार) को प्रातःकाल (उम्र 47) उनका देहान्त काशी में हुआ।

रचनाएँ
काव्य
  1. कानन कुसुम
  2. झरना
  3. आंसू
  4. लहर
  5. कामायनी
  6. प्रेम पथिक
कहानी

कथा के क्षेत्र में प्रसाद जी आधुनिक ढंग की कहानियों के आरंभयिता माने जाते हैं। सन्‌ 1912 ई. में 'इंदु' में उनकी पहली कहानी 'ग्राम' प्रकाशित हुई। उन्होंने कुल 72 कहानियाँ लिखी हैं।


उपन्यास

प्रसाद ने तीन उपन्यास लिखे हैं।


इन्होंने अपने उपन्यासों में ग्राम, नगर, प्रकृति और जीवन का मार्मिक चित्रण किया है जो भावुकता और कवित्व से पूर्ण होते हुए भी प्रौढ़ लोगों की शैल्पिक जिज्ञासा का समाधान करता है।

नाटक
  1. स्कंदगुप्त
  2. चंद्रगुप्त
  3. ध्रुवस्वामिनी
  4. जन्मेजय का नाग यज्ञ
  5. राज्यश्री
  6. कामना
  7. एक घूंट
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
 
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
लेखक
जन्म

21 फरवरी, 1896

जन्म स्थान

बंगाल की महिषादल जिला मेदिनीपुर

मृत्यू

15 अक्टूबर, 1961

पिता

पंडित रामसहाय तिवारी

सम्मान

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कई कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।

शिक्षा - दीक्षा

वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ाकोला नामक गाँव के निवासी थे, निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। बाद में हिन्दी संस्कृत और बाङ्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया। पिता की छोटी-सी नौकरी की असुविधाओं और मान-अपमान का परिचय निराला को आरम्भ में ही प्राप्त हुआ। उन्होंने दलित-शोषित किसान के साथ हमदर्दी का संस्कार अपने अबोध मन से ही अर्जित किया। तीन वर्ष की अवस्था में माता का और बीस वर्ष का होते-होते पिता का देहांत हो गया। अपने बच्चों के अलावा संयुक्त परिवार का भी बोझ निराला पर पड़ा। पहले महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। शेष कुनबे का बोझ उठाने में महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में बीता। निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गंवाया। जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता। वहीं दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में 15 अक्टूबर 1961 को उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की।

कार्यक्षेत्र

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की पहली नियुक्ति महिषादल राज्य में ही हुई। उन्होंने 1918 से 1922 तक यह नौकरी की। उसके बाद संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य की ओर प्रवृत्त हुए। 1922 से 1923 के दौरान कोलकाता से प्रकाशित 'समन्वय' का संपादन किया, 1923 के अगस्त से मतवाला के संपादक मंडल में कार्य किया। इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई जहाँ वे संस्था की मासिक पत्रिका सुधा से 1935 के मध्य तक संबद्ध रहे। 1935 से 1940 तक का कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी बिताया। इसके बाद 1942 से मृत्यु पर्यन्त इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य किया। उनकी पहली कविता जन्मभूमि प्रभा नामक मासिक पत्र में जून 1920 में, पहला कविता संग्रह 1923 में अनामिका नाम से, तथा पहला निबंध बंग भाषा का उच्चारण अक्टूबर 1920 में मासिक पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुआ।

रचनायें
काव्य संग्रह
  1. अनामिका
  2. परिमल
  3. गीतिका
  4. अनामिका (द्वितीय)
  5. तुलसीदास
  6. कुकुरमुत्ता
  7. अणिमा
  8. बेला
  9. नये पत्ते
  10. अर्चना
  11. आराधना
  12. गीत कुंज
  13. सांध्य काकली
  14. अपरा
उपन्यास
  1. अप्सरा
  2. अलका
  3. प्रभावती
  4. निरुपमा
  5. कुल्ली भाट
  6. बिल्लेसुर बकरिहा
  7. चमेली
कहानी संग्रह
  1. लिली
  2. सखी
  3. चतुरी चमार
  4. देवी
  5. सुकुल की बीवी
निबन्ध-आलोचना
  1. रवीन्द्र कविता कानन
  2. प्रबंध पद्म
  3. प्रबंध प्रतिमा
  4. चाबुक
  5. चयन
  6. संग्रह
पुराण कथा
  1. महाभारत
  2. रामायण की अन्तर्कथाएँ
बालोपयोगी साहित्य
  1. रामचरितमानस (विनय-भाग)-1948 (खड़ीबोली हिन्दी में पद्यानुवाद)
  2. आनंद मठ (बाङ्ला से गद्यानुवाद)
  3. विष वृक्ष
  4. कृष्णकांत का वसीयतनामा
  5. कपालकुंडला
  6. दुर्गेश नन्दिनी
  7. राज सिंह
  8. राजरानी
  9. देवी चौधरानी
  10. युगलांगुलीय
  11. चन्द्रशेखर
  12. रजनी
  13. श्रीरामकृष्णवचनामृत (तीन खण्डों में)
  14. परिव्राजक
  15. भारत में विवेकानंद
अनुवाद
  1. रामचरितमानस (विनय-भाग)-1948 (खड़ीबोली हिन्दी में पद्यानुवाद)
  2. आनंद मठ (बाङ्ला से गद्यानुवाद)
  3. विष वृक्ष
  4. कृष्णकांत का वसीयतनामा
  5. कपालकुंडला
  6. दुर्गेश नन्दिनी
  7. राज सिंह
  8. राजरानी
  9. देवी चौधरानी
  10. युगलांगुलीय
  11. चन्द्रशेखर
  12. रजनी
  13. श्रीरामकृष्णवचनामृत (तीन खण्डों में)
  14. परिव्राजक
  15. भारत में विवेकानंद
सुमित्रानंदन पंत
 
सुमित्रानंदन पंत
कवि
जन्म

20 मई 1900

जन्म स्थान

कौसानी बागेश्वर उत्तराखंड

मृत्यू

28 दिसम्बर 1977

पिता

गंगादत्त पंत

माता

सरस्वती देवी

सम्मान

हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया।

"चिदम्बरा" नामक रचना के लिये 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। "कला और बूढ़ा चांद" के लिये 1960 का साहित्य अकादमी पुरस्कार। इसके अलावा अनेकों प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित किया गया

सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।

शिक्षा - दीक्षा
  • 1910 में शिक्षा प्राप्त करने गवर्नमेंट हाईस्कूल अल्मोड़ा गये। यहीं उन्होंने अपना नाम गोसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रनंदन पंत रख लिया।
  • 1918 में मँझले भाई के साथ काशी गये और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण कर म्योर कालेज में पढ़ने के लिए इलाहाबाद चले गए।
  • 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे। इलाहाबाद में ही उनकी काव्यचेतना का विकास हुआ। कुछ वर्षों के बाद उन्हें घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। कर्ज से जूझते हुए पिता का निधन हो गया। कर्ज चुकाने के लिए जमीन और घर भी बेचना पड़ा। इन्हीं परिस्थितियों में वह मार्क्सवाद की ओर उन्मुख हुये।
  • 1931 में कुँवर सुरेश सिंह के साथ कालाकांकर, प्रतापगढ़ चले गये और अनेक वर्षों तक वहीं रहे। महात्मा गाँधी के सान्निध्य में उन्हें आत्मा के प्रकाश का अनुभव हुआ।
  • 1938 में प्रगतिशील मासिक पत्रिका 'रूपाभ' का सम्पादन किया। श्री अरविन्द आश्रम की यात्रा से आध्यात्मिक चेतना का विकास हुआ।
  • 1950 से 1957 तक आकाशवाणी में परामर्शदाता रहे।
  • 1958 में 'युगवाणी' से 'वाणी' काव्य संग्रहों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन 'चिदम्बरा' प्रकाशित हुआ, जिसपर 1968 में उन्हें 'भारतीय ज्ञानपीठ' पुरस्कार प्राप्त हुआ।
  • 1960 में 'कला और बूढ़ा चाँद' काव्य संग्रह के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' प्राप्त हुआ।
  • 1961 में 'पद्मभूषण' की उपाधि से विभूषित हुये।
  • 1964 में विशाल महाकाव्य 'लोकायतन' का प्रकाशन हुआ।
  • कालान्तर में उनके अनेक काव्य संग्रह प्रकाशित हुए। वह जीवन-पर्यन्त रचनारत रहे। अविवाहित पंत जी के अंतस्थल में नारी और प्रकृति के प्रति आजीवन सौन्दर्यपरक भावना रही।
कविता संग्रह
प्रमुख कृतियाँ


 

अन्य कृतियाँ
  1. अतिमा
  2. ग्राम्‍या
  3. मुक्ति यज्ञ
  4. मेघनाद वध
  5. युगांत
  6. स्वच्छंद
महादेवी वर्मा
 
महादेवी वर्मा
उपन्यासकार, कवयित्री, लघुकथा लेखिका
जन्म

26 मार्च 1907

जन्म स्थान

फ़र्रुख़ाबाद उत्तर प्रदेश

मृत्यू

11 सितम्बर 1987 (उम्र 80)

पिता

बाबू गोविन्द प्रसाद वर्मा

माता

हेमरानी देवी

सम्मान

सेकसरिया व मंगला प्रसाद पुरस्कार

भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण सम्मान

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ज्ञानपीठ पुरस्कार

आधुनिक युग की मीरा के नाम से प्रसिद्ध महादेवी वर्मा का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है।कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती भी कहा है। उनकी काव्य रचनाओं में नारी हृदय की वेदना का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। हिंदी को इनकी अभूतपूर्व देन इनके रेखाचित्र हैं।

 

शिक्षा - दीक्षा
  • महादेवी जी की शिक्षा इंदौर में मिशन स्कूल से प्रारम्भ हुई साथ ही संस्कृत, अंग्रेज़ी, संगीत तथा चित्रकला की शिक्षा अध्यापकों द्वारा घर पर ही दी जाती रही।
  • बीच में विवाह जैसी बाधा पड़ जाने के कारण कुछ दिन शिक्षा स्थगित रही। विवाहोपरान्त महादेवी जी ने १९१९ में क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया।
  • महादेवी जी ने सन 1933 ई॰ में इलाहाबाद विश्व विद्यालय से संस्कृत में एम॰ए॰ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया।
  • साहित्य की प्रारम्भिक शिक्षा इन्हें परिवार से प्राप्त हुई।
पद्य साहित्य में योगदान
कविता संग्रह
  1. नीहार
  2. रश्मि
  3. नीरजा
  4. सांध्यगीत
  5. दीपशिखा
  6. सप्तपर्णा अनूदित-
  7. प्रथम आयाम
  8. अग्निरेखा
गद्य साहित्य में योगदान
रेखाचित्र
  1. अतीत के चलचित्र
  2. स्मृति की रेखाएं
संस्मरण
  1. पथ के साथी
  2. मेरा परिवार
  3. संस्मरण
निबंध
  1. शृंखला की कड़ियाँ (१९४२),
  2. विवेचनात्मक गद्य (१९४२),
  3. साहित्यकार की आस्था
  4. अन्य निबंध (१९६२),
  5. संकल्पिता (१९६९)
कहानियाँ
  1. गिल्लू
अन्य
  1. चुने हुए भाषणों का संकलन: संभाषण
  2. ललित निबंध: क्षणदा
  3. संस्मरण, रेखाचित्र और निबंधों का संग्रह: हिमालय
रामधारी सिंह दिनकर
 
रामधारी सिंह दिनकर
कवि, लेखक
जन्म

23 सितम्बर 1908

जन्म स्थान

मद्रास, तमिलनाडु, भारत

मृत्यू

24 अप्रैल 1974

रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।

'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है।

शिक्षा - दीक्षा

उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। 1950 से 1952 तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने।

प्रमुख रचनाएँ
काव्य
  1. बारदोली-विजय संदेश
  2. प्रणभंग
  3. रेणुका
  4. हुंकार
  5. रसवन्ती
  6. द्वंद्वगीत
  7. कुरूक्षेत्र
  8. धूप-छाँह
  9. सामधेनी
  10. बापू
  11. इतिहास के आँसू
  12. धूप और धुआँ
  13. मिर्च का मज़ा
  14. रश्मिरथी
  15. दिल्ली
  16. नीम के पत्ते
  17. नील कुसुम
  18. सूरज का ब्याह
  19. चक्रवाल
  20. कवि-श्री
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
 
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
कवि
जन्म
जन्म स्थान
मृत्यू
पिता
सम्मान

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