कक्षा 9 लेखकों का जीवन परिचय

UP Board के कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में गद्य तथा पद्य में कुल 21 लेखको की जीवनी दी गयी है। जिनमे से गद्य से तथा पद्य से अलग अलग 1-1 जीवनी परीक्षा में पूछी जाती है। कक्षा 9 लेखकों का जीवन परिचय कुल 6 अंक का पूछा जाता है। लेखकों तथा कवियों के जीवन परिचय से क्रमशाः 3 और 3 अंक के प्रश्न पूछे जाते है। यहाँ सभी रचनाकारों की रचनाएँ सहित उनका जीवन परिचय सरल भाषा में दिया जा रहा है।

कक्षा 9 लेखकों का जीवन परिचय

कक्षा 9 लेखकों का जीवन परिचय
गद्य के लेखक
पंडित प्रताप नारायण मिश्र

जन्म

24 सितम्बर 1856

जन्म स्थान

ग्राम बैजे उन्नाव उत्तर प्रदेश

मृत्यू

6 जुलाई, 1894

पिता

संकटा प्रसाद मिश्र


 
पंडित प्रताप नारायण मिश्र
लेखक, कवि और पत्रकार

वह भारतेंदु निर्मित एवं प्रेरित हिंदी लेखकों की सेना के महारथी, उनके आदर्शो के अनुगामी और आधुनिक हिंदी भाषा तथा साहित्य के निर्माणक्रम में उनके सहयोगी थे। भारतेंदु पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी, वह अपने आप को उनका शिष्य कहते तथा देवता की भाँति उनका स्मरण करते थे। भारतेंदु जैसी रचनाशैली, विषयवस्तु और भाषागत विशेषताओं के कारण मिश्र जी "प्रति-भारतेंदु" और "द्वितीय हरिश्चंद्र" कहे जाने लगे थे।


शिक्षा

मिश्रा जी की प्रारंभिक शिक्षा कानपुर में हुई। इनके पिता इन्हें ज्योतिष ज्ञान कराकर पैतृक व्यवसाय में लगाना चाहते थे। परंतु मनमौजी स्वभाव होने के कारण मिश्र जी ने स्वाध्याय से ही संस्कृत उर्दू फारसी अंग्रेजी और बांग्ला भाषा का ज्ञान प्राप्त किया।

रचनाएँ
नाटक
  • गो संकट,
  • भारत दुर्दशा,
  • कलिकौतुक,
  • कलिप्रभाव,
  • हठी हम्मीर
  • जुआरी-खुआरी (प्रहसन)
  • संगीत शाकुंतल (कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुंतम्' का अनुवाद)
निबंध संग्रह
  • निबंध नवनीत,
  • प्रताप पीयूष,
  • प्रताप समीक्षा
अनूदित गद्य कृतियाँ
  • राजसिंह,
  • अमरसिंह,
  • इन्दिरा,
  • राधारानी,
  • युगलांगुरीय,
  • चरिताष्टक,
  • पंचामृत,
  • नीतिरत्नमाला,
  • बात
कविता
  • प्रेम पुष्पावली,
  • मन की लहर,
  • ब्रैडला स्वागत,
  • दंगल खंड,
  • तृप्यन्ताम्,
  • लोकोक्तिशतक,
  • दीवो बरहमन (उर्दू)

मुंशी प्रेमचंद्र

जन्म

1880

जन्म स्थान

लमही वाराणसी उत्तर प्रदेश

मृत्यू

08 अक्टूबर 1930

पिता

मुंशी अजायबराय

माता

आनन्दी देवी

सम्मान

1918 से 1936 तक के कालखंड को 'प्रेमचंद युग' कहा जाता है।


 
मुंशी प्रेमचंद
अध्यापक, लेखक (कहानी और उपन्यासकार), पत्रकार

प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनमें से अधिकांश हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुईं। उन्होंने अपने दौर की सभी प्रमुख उर्दू और हिंदी पत्रिकाओं जमाना, सरस्वती, माधुरी, मर्यादा, चाँद, सुधा आदि में लिखा। उन्होंने हिंदी समाचार पत्र जागरण तथा साहित्यिक पत्रिका हंस का संपादन और प्रकाशन भी किया। इसके लिए उन्होंने सरस्वती प्रेस खरीदा जो बाद में घाटे में रहा और बंद करना पड़ा। प्रेमचंद फिल्मों की पटकथा लिखने मुंबई आए और लगभग तीन वर्ष तक रहे। जीवन के अंतिम दिनों तक वे साहित्य सृजन में लगे रहे। महाजनी सभ्यता उनका अंतिम निबंध, साहित्य का उद्देश्य अंतिम व्याख्यान, कफन अंतिम कहानी, गोदान अंतिम पूर्ण उपन्यास तथा मंगलसूत्र अंतिम अपूर्ण उपन्यास माना जाता है।

1906 से 1936 के बीच लिखा गया प्रेमचंद का साहित्य इन तीस वर्षों का सामाजिक सांस्कृतिक दस्तावेज है। इसमें उस दौर के समाजसुधार आंदोलनों, स्वाधीनता संग्राम तथा प्रगतिवादी आंदोलनों के सामाजिक प्रभावों का स्पष्ट चित्रण है। उनमें दहेज, अनमेल विवाह, पराधीनता, लगान, छूआछूत, जाति भेद, विधवा विवाह, आधुनिकता, स्त्री-पुरुष समानता, आदि उस दौर की सभी प्रमुख समस्याओं का चित्रण मिलता है। आदर्शोन्मुख यथार्थवाद उनके साहित्य की मुख्य विशेषता है। हिंदी कहानी तथा उपन्यास के क्षेत्र में 1918 से 1936 तक के कालखंड को 'प्रेमचंद युग' कहा जाता है।


शिक्षा

प्रेमचंद के जीवन का साहित्य से क्या संबंध है इस बात की पुष्टि रामविलास शर्मा के इस कथन से होती है कि-



रचनाएँ
उपन्यास

मुंशी जी ने डेढ़ दर्जन से ज़्यादा तक उपन्यास लिखे।


कहानी

प्रेमचंद ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं जिनमे मुख्य रूप से निम्न कहानियो की रचना की-



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नाटक
  • संग्राम
  • कर्बला
  • प्रेम की वेदी

हजारी प्रसाद द्विवेदी

जन्म

सन 1907 ई॰

जन्म स्थान

दुबे का छपरा बलिया उत्तर प्रदेश

मृत्यू

19 मई 1979

पिता

अनमोल द्विवेदी

सम्मान

हजारी प्रसाद द्विवेदी को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन 1957 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।


 
हजारी प्रसाद द्विवेदी
साहित्यकार

द्विवेदी जी का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली और उनका स्वभाव बड़ा सरल और उदार था। वे हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत और बाङ्ला भाषाओं के विद्वान थे। भक्तिकालीन साहित्य का उन्हें अच्छा ज्ञान था।


शिक्षा

द्विवेदी जी ने इंटर तक की शिक्षा प्राप्त करके ज्योतिष शास्त्र में आचार्य की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन 1940 से 1950 ईस्वी तक वे शांतिनिकेतन में हिंदी विभाग के निदेशक के रूप में रहे। यही इनकी साहित्य प्रतिभा का विकास हुआ। उसके बाद द्विवेदी जी को सन 1949 ईस्वी में लखनऊ विश्वविद्यालय ने डी लिट की उपाधि से विभूषित किया। इन्होंने काशी विश्वविद्यालय कथा चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यक्ष पद पर कार्य किया।

रचनाएँ
निबंध संग्रह
  • अशोक के फूल
  • कल्‍पलता
  • विचार और वितर्क
  • विचार-प्रवाह
  • कुटज
  • विश के दन्त
  • कल्पतरु
  • गतिशील चिंतन
  • साहित्य सहचर
उपन्‍यास
  • बाणभट्ट की आत्‍मकथा
  • चारु चंद्रलेख
  • पुनर्नवा
  • अनामदास का पोथा
ग्रंथ
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली

महादेवी वर्मा

जन्म

26 मार्च 1907

जन्म स्थान

फ़र्रुख़ाबाद उत्तर प्रदेश

मृत्यू

11 सितम्बर 1987 (उम्र 80)

पिता

बाबू गोविन्द प्रसाद वर्मा

माता

हेमरानी देवी

सम्मान

सेकसरिया व मंगला प्रसाद पुरस्कार

भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण सम्मान

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ज्ञानपीठ पुरस्कार


 
महादेवी वर्मा
उपन्यासकार, कवयित्री, लघुकथा लेखिका

आधुनिक युग की मीरा के नाम से प्रसिद्ध महादेवी वर्मा का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है।कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती भी कहा है। उनकी काव्य रचनाओं में नारी हृदय की वेदना का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। हिंदी को इनकी अभूतपूर्व देन इनके रेखाचित्र हैं।

 


शिक्षा - दीक्षा
  • महादेवी जी की शिक्षा इंदौर में मिशन स्कूल से प्रारम्भ हुई साथ ही संस्कृत, अंग्रेज़ी, संगीत तथा चित्रकला की शिक्षा अध्यापकों द्वारा घर पर ही दी जाती रही।
  • बीच में विवाह जैसी बाधा पड़ जाने के कारण कुछ दिन शिक्षा स्थगित रही। विवाहोपरान्त महादेवी जी ने १९१९ में क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया।
  • महादेवी जी ने सन 1933 ई॰ में इलाहाबाद विश्व विद्यालय से संस्कृत में एम॰ए॰ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया।
  • साहित्य की प्रारम्भिक शिक्षा इन्हें परिवार से प्राप्त हुई।
पद्य साहित्य में योगदान
कविता संग्रह
  1. नीहार
  2. रश्मि
  3. नीरजा
  4. सांध्यगीत
  5. दीपशिखा
  6. सप्तपर्णा अनूदित-
  7. प्रथम आयाम
  8. अग्निरेखा
गद्य साहित्य में योगदान
रेखाचित्र
  1. अतीत के चलचित्र
  2. स्मृति की रेखाएं
संस्मरण
  1. पथ के साथी
  2. मेरा परिवार
  3. संस्मरण
निबंध
  1. शृंखला की कड़ियाँ (१९४२),
  2. विवेचनात्मक गद्य (१९४२),
  3. साहित्यकार की आस्था
  4. अन्य निबंध (१९६२),
  5. संकल्पिता (१९६९)
कहानियाँ
  1. गिल्लू
अन्य
  1. चुने हुए भाषणों का संकलन: संभाषण
  2. ललित निबंध: क्षणदा
  3. संस्मरण, रेखाचित्र और निबंधों का संग्रह: हिमालय

काका कालेलकर

जन्म

सन 1885

जन्म स्थान

सतारा महाराष्ट्र

मृत्यू

21 अगस्त 1981

पिता

बालकृष्ण कालेलकर

सम्मान

1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार : जीवन-व्यवस्था नामक गुजराती निबन्ध-संग्रह के लिये 1971 में उन्हें साहित्य अकादमी का फेलो बनाया गया।


 
काका कालेलकर
शिक्षाशास्त्री, पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

काका कालेलकर सच्चे बुद्धिजीवी व्यक्ति थे। लिखना सदा से उनका व्यसन रहा। सार्वजनिक कार्य की अनिश्चितता और व्यस्तताओं के बावजूद यदि उन्होंने बीस से ऊपर ग्रंथों की रचना कर डाली इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इनमें से कम-से-कम 5-6 उन्होंने मूल रूप से हिंदी में लिखी। यहाँ इस बात का उल्लेख भी अनुपयुक्त न होगा कि दो-चार को छोड़ बाकी ग्रंथों का अनुवाद स्वयं काका साहब ने किया, अतः मौलिक हो या अनूदित वह काका साहब की ही भाषा शैली का परिचायक हैं। हिंदी में यात्रा-साहित्य का अभी तक अभाव रहा है। इस कमी को काका साहब ने बहुत हदतक पूरा किया। उनकी अधिकांश पुस्तकें और लेख यात्रा के वर्णन अथवा लोक-जीवन के अनुभवों के आधार पर लिख गए। हिंदी, हिंदुस्तानी के संबंध में भी उन्होंने कई लेख लिखे।


शिक्षा

इनका परिवार मूल रूप से कर्नाटक के करवार जिले का रहने वाला था और उनकी मातृभाषा कोंकणी थी। लेकिन सालों से गुजरात में बस जाने के कारण गुजराती भाषा पर उनका बहुत अच्छा अधिकार था और वे गुजराती के प्रख्यात लेखक समझे जाते थे।

 

जिन नेताओं ने राष्ट्रभाषा प्रचार के कार्य में विशेष दिलचस्पी ली और अपना समय अधिकतर इसी काम को दिया, उनमें प्रमुख काकासाहब कालेलकर का नाम आता है। उन्होंने राष्ट्रभाषा के प्रचार को राष्ट्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत माना है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के अधिवेशन में (1938) भाषण देते हुए उन्होंने कहा था, हमारा राष्ट्रभाषा प्रचार एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है।

उन्होंने पहले स्वयं हिंदी सीखी और फिर कई वर्षतक दक्षिण में सम्मेलन की ओर से प्रचार-कार्य किया। अपनी सूझ-बूझ, विलक्षणता और व्यापक अध्ययन के कारण उनकी गणना प्रमुख अध्यापकों और व्यवस्थापकों में होने लगी। हिंदी-प्रचार के कार्य में जहाँ कहीं कोई दोष दिखाई देते अथवा किन्हीं कारणों से उसकी प्रगति रुक जाती, गांधी जी काका कालेलकर को जाँच के लिए वहीं भेजते। इस प्रकार के नाज़ुक काम काका कालेलकर ने सदा सफलता से किए। 

 

रचनाएँ
गुजराती
  • हिमालयनो प्रवास
  • जीवन-व्यवस्था
  • पूर्व अफ्रीकामां
  • जीवनानो आनन्द
  • जीवत तेहवारो
  • मारा संस्मरणो
  • उगमानो देश
  • ओत्तेराती दिवारो
हिन्दी
  • महात्मा गांधी का स्वदेशी धर्म
  • राष्ट्रीय शिक्षा का आदर्श
मराठी
  • स्मरण यात्रा
  • उत्तरेकादिल भिन्टी
  • हिन्दलग्याचा प्रसाद
  • लोकमाता
  • लतान्चे ताण्डव
  • हिमालयतिल प्रवास

रवींद्र नाथ टैगोर

जन्म

1861

जन्म स्थान

कलकत्ता (कोलकाता)

मृत्यू

7 अगस्त 1941

पिता

देवेंद्र नाथ टैगोर

माता

शारदा देवी

सम्मान

गीतांजलि के लिये उन्हे सन् १९१३ में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला


 
रवींद्र नाथ टैगोर
कवि, नाटककार, कथाकार, निबंधकार

रबीन्द्रनाथ ठाकुर विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बाँग्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।


शिक्षा

इनकी प्रारंभिक शिक्षा बांग्ला भाषा में घर पर ही हुई। प्रारंभिक शिक्षा समाप्त होने के पश्चात इनका प्रवेश पहले कोलकाता के ओरिएंटल सेमिनार विद्यालय और फिर नॉर्मल विद्यालय में कराया गया। विद्यालय वातावरण में इनका मन नहीं लगता था, अतः इनको एकांत बहुत प्रिय था। विद्यालय शिक्षा समाप्त करने के पश्चात इनके पिता ने बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इन्हें इंग्लैंड भेजा, किंतु यह बैरिस्टर ई की डिग्री पूरी किए बिना ही वापस चले आए। इन्होंने घर पर रहकर ही हिंदी साहित्य में कई योगदान दिए।

कक्षा 10 लेखकों का जीवन परिचय

3 thoughts on “कक्षा 9 लेखकों का जीवन परिचय”

  1. Hme to kuch samajh hi nhi aa raha he sir ya mem isme koi sens wali chij hi nhi he ki ye kesa likha gya he oor isme kaha se jeevan parichay ya kaha se kuch oor le aaya gya he ye to samjhaiye sir plese

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