कामायनी का श्रद्धा सर्ग

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शिक्षा - दीक्षा
पद्य साहित्य में योगदान
गद्य साहित्य में योगदान

कामायनी का श्रद्धा सर्ग में मनु व श्रद्धा को चित्रित किया गया है। एक दिन जब मनु विचारों में लीन थे। तभी अचानक एक सुंदर संपन्न स्त्री ने उनके सम्मुख आकर पूछा कि इन जनहिन प्रदेशों में अपनी रूप बिखेरने वाले तुम कौन हो। नीग्रो वाली चिकने चर्म खंडों से ढका हुआ उस स्त्री का अर्धनग्न शरीर ऐसा प्रतीत होता था जैसे काले बादलों के वन में बिजली के फूल खिल उठे हो। वह गांधार प्रदेश की रहने वाली श्रद्धा थी। जिसकी सुंदरता मनु देखते ही रह गए।

हिमालय के दर्शन के लिए वह घर से निकल पड़ी थी और एक वृक्ष के नीचे खाद्य सामग्री देख कर उसे अनुमान हो गया था कि प्रलय होने के बाद भी कोई व्यक्ति इधर निकट में अभी जीवित है। मनु ने कहा मैं एक अभागा व्यक्ति हूं मैंने अपनी आंखों से असर के स्वपन विनाश का क्रूर ने देखा है। श्रद्धा बोली प्रसिद्ध परिस्थितियों के चक्र में पीसकर कभी-कभी ऐसे अशोक भावना का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। तुम्हारा अतीत दुख में रहा यह सत्य है। पर तुम उसी प्रकार के भविष्य की व्यर्थ कल्पना इस आधार पर करते हो वह सुख में हो सकता है। जीवन में यदि सुखी सुख होता तो भी प्राणी उससे ऊब जाता।

वस्तुओं के स्थायित्व को लेकर तुम क्या करोगे जो वस्तु जीवन हो चुकी है जिसका उपयोग नष्ट हो चुका है। उसे मिट जाने दो परिवर्तन को नित्य नवीनता के रूप में देखो किसी का एकाकी जीवन कभी सफल नहीं रहा था। बिना किसी प्रकार की हिचक के तुम्हारे जीवन में सुख भरने के लिए मैं तैयार रहूंगी। प्रत्येक कार्य के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य अवश्य होता है। कामायनी के श्रद्धा सर्ग में प्रसाद जी ने अपने उद्देश्यों का प्रतिपादन किया है और इन्हीं उद्देश्यों में प्रसाद जी के व्यक्तित्व विचार भी दृष्टिगोचर होते हैं। श्रद्धा का संक्षिप्त परिचय निराशा और पलायन वादी व्यक्ति के लिए आशा और कर्मठता का मधुर संदेश देती है।

प्रसाद जी के अनुसार जीवन को गतिशील बनाए रखने के लिए परिवर्तन आवश्यक है। लेकिन या पर उत्तम समृद्धि से संपन्न होना चाहिए। निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि काव्यात्मक सौंदर्य कामायनी का श्रद्धा सर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है।

  • कामायनी का अर्थ है- काम गोत्रजा।
  • कामायनी प्रसाद जी के महाकाव्य प्रकार की कृति है।
  • कामायनी में सर्गो की संख्या 15 है।
  • जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी में हुआ था।
  • प्रसाद जी के पिता का नाम देवीदास था।
  • छायावाद के प्रवर्तक में प्रसाद जी का नाम सर्वप्रथम आता है।
  • प्रसाद जी का जन्म सुंघनी साहू परिवार में हुआ था।
  • कामायनी के कथा का स्वरूप प्रगति हासिक है।
  • कामायनी नायिका प्रधान महाकाव्य है।
  • कामायनी का प्रतिपाद्य विषय आनंद बाद है।
  • कामायनी महाकाव्य में शांत, श्रृंगार और वीर रस का प्रयोग हुआ है।
  • जयशंकर प्रसाद के पालन-पोषण, शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था संभू रतन जी के सानिध्य में हुआ था।
  • जो हमें माता-पिता द्वारा वंशानुक्रम कामायनी महाकाव्य की रचना सन 1935 ईस्वी में की गई।
  • कामायनी के श्रद्धा सर्ग में श्रद्धा एवं मनु का संवाद है
  • कामायनी में श्रद्धा हरदय की प्रतीक है।
  • जयशंकर प्रसाद को कामायनी रचना पर मंगला प्रसाद पारितोषिक दिया गया।
  • प्रसाद के आंसू के काव्य दृष्टि विरह काव्य की है।
  • प्रसाद की प्रेम प प्रथिक कृति ब्रजभाषा से खड़ी बोली में रूपांतरित की गई है।
  • प्रसाद के ब्रजभाषा कविताओं का संकलन चिताधार में है।
  • प्रसाद जी मूल्यता प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं।
  • श्रद्धा के व्यक्तित्व में दया, ममता मधुरिमा त्याग सहानुभूति एवं क्षमा विद्यमान है।
  • काम की पुत्री होने के कारण श्रद्धा का दूसरा नाम कामायनी है।
  • काव्य का प्रसाद ने व्यापक समर्थ लिया है।
  • कामायनी में श्रद्धा आधा सत्य की इच्छा ही संदेश सुनाने के लिए अवतरित हुई है।
  • प्रसाद की कामायनी में भावुकता का स्थान सर्वोपरि है।
  • नायक मनु का मार्ग पर अग्रसर होने वाले एक सामान्य पथिक मात्र है।
  • कामायनी के प्रमुख पात्र मनु, श्रद्धा, इडा, मनु और श्रद्धा का पुत्र कुमार तथा असुर पुरोहित आकुल और कीलात हैं।
  • कामायनी में काम और लज्जा अशरीरी पात्र हैं।
  • कामायनी आधुनिक युग का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है।
  • कामायनी के आधार पर मानव का विकास श्रद्धा विश्वास से हो सकता है।
  • जयशंकर प्रसाद को छायावाद का प्रवर्तक माना जाता है।
  • जयशंकर प्रसाद की रचनाएं द्विवेदी युगीन है।

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