कुरुक्षेत्र का छठा सर्ग

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शिक्षा - दीक्षा
पद्य साहित्य में योगदान
गद्य साहित्य में योगदान

राष्ट्रीय भावनाओं के अमर गायक रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘का जन्म बिहार प्रांत के मुंगेर जिले में सिमरिया नामक ग्राम में 30 सितंबर सन 1980 में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। जब यह 2 वर्ष के थे, तभी इनके पिता का देहांत हो गया। आपकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही शुरु थी तथा आपने 1928 ईस्वी में हाई स्कूल, 1930 मैं इंटर प्रधानाध्यापक बने। 1950 ईस्वी में आप भूमिहार ब्रह्मांड कॉलेज मुजफ्फरनगर में हिंदी विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए, 1952 में नौकरी से त्यागपत्र देकर राज्यसभा के सदस्य हो गए। यह 1962 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

आप भारत सरकार के गृह विभाग में हिंदी सलाहकार के रूप में एक लंबे समय तक हिंदी के संवर्धन एवं प्रचार प्रसार में कार्यरत है।इसकी साहित्यिक प्रतिभा एवं सेवा का सम्मान करते हुए राष्ट्रपति ने उन्हें ‘की उपाधि से सम्मानित किया।आप को साहित्यअकादमी पुरस्कार तथा प्रसिद्ध कृति उवर्शी पर ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। सन 1962 इसवी में भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा आपको डीलिस्ट की उपाधि प्राप्त की गई। दिनकर जी का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षमय रहा है।

24 अप्रैल 1974 ईस्वी को आप का देहांत हो गया ‘रेणुका’ दिनकर का प्रथम काव्य संघर्ष है। हुंकार, रसवंती, द्वंद गीत , समघेनी, कुरुक्षेत्र रश्मिरथी उर्वशी परशुराम की प्रतीक्षा दिनकर जी की प्रमुख कृतियां है। इसके अतिरिक्त चक्रवाल, धूप -छांव, हारे का हरिराम, नील के पत्ते ,नील कुसुम, सीपी और शंख ,बापू, इतिहास के आंसू आदि काव्य कृतियां है’ कुरुक्षेत्र’एक प्रबंध काव्य है। इसका प्रणयन अहिंसा और हिंसा के बीच अंतर्द्वंद के फल स्वरुप हुआ।

कुरुक्षेत्र की ‘कथावस्तु’ का आधार महाभारत के युद्ध की घटना है, जिसमें वर्तमान युग की ज्वलंत युद्ध समस्या का उल्लंघन है।’दिनकर ‘के कुरुक्षेत्र प्रबंध काव्य की कथावस्तु सात सर्गो में विभक्त है। कुरुक्षेत्र के छठे सर्ग के अंतर्गत आधुनिक युग की समस्याओं, मानवीय रचनात्मक प्रवृत्तियों तथा कोरे मानसिक उत्थान की निंदा की गई है। कवि भगवान से धर्म, दया, शांति आदि की स्थापना से संबंधित प्रश्न करता है। आधुनिक वैज्ञानिक विकास की काफी चर्चा की गई है।

मानव वंशज की वायु, अग्नि ,आकाश, पृथ्वी सब कुछ है ।कवि खेद करता है कि मनुष्य के मानसिक विकास का उसके हृदय के साथ नहीं दिया है, उनकी उन्नति एकांकी है, अधूरी है अतएव परिपूर्ण महत्व नहीं है । उसके मिले-जुले विकास के लिए ज्ञान ही नहीं प्रेम और बलिदान भी आवश्यक है। मानव जीवन श्रेय का सर्वोच्च स्थान है , उसके लिए उसे असीमित मानव से प्रेम विषमता के अंतर को कम करने तथा हृदय एवं बुद्धि पक्ष में संतुलन बनाए रखने की महती आवश्यक है।

  • दिनकर का पूरा नाम रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘है।
  • दिनकर जी का जन्म 23 सितंबर, 1908 में हुआ।
  • आप के पिता जी का नाम रविनाथ सिंह था।
  • दिनकर दिनकर जी का जन्म मुंगेर जिले के सिमरिया गांव में हुआ था।

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