रैनी देकार्ते के योगदान

रैनी देकार्ते एक फ्रेंच दार्शनिक था। उसने मात्र 8 वर्ष की आयु में कॉलेज में प्रवेश लिया तथा परंपरागत विषयों जैसे गणित, भौतिक तर्क तथा प्राचीन भाषाओं में शिक्षा ग्रहण की। स्कूल जीवन में उनका स्वास्थ्य बहुत खराब रहता था जिसकी वजह से उन्हें सुबह 11:00 बजे तक बिस्तर पर रहने की अनुमति थी तथा इस परंपरा को उन्होंने मृत्यु पर्यंत तक जारी रखा।

स्कूल में एकमात्र विषय जिसमें उनकी रूचि थी वह गणित ही था। उनका जीवन अस्त-व्यस्त रहा तथा उन्होंने लगभग पूरे द्वीप का भ्रमण किया। बाद में सन 1628 में वह अपनी इस अनवरत यात्रा से थक गए और हालैंड में बसने का मन बना लिया। उन्होंने इस जगह का चयन बहुत सोच विचार करने के बाद अपनी प्रकृति के अनुरूप किया था।

रैनी देकार्ते के पदार्पण से पूर्व गणित को मुख्यता दो भागों में पढ़ा जाता था। एक तो बीजगणित और दूसरा ज्यामिति था। बीजगणित में जहां अमूर्त चिंतन पर बल दिया जाता है वही रेखा गणित में रेखाओं के माध्यम से अमूर्त को रूप प्रदान किया जाता है।

गणित की यह दोनों धाराएं बहुत लंबे समय तक एक दूसरे से स्वतंत्र रूप में विकसित होती रही और इस क्रम में गणित के विकास में भरपूर योगदान दिया।

रैनी देकार्ते के योगदान

रैनी देकार्ते के योगदान

ज्यामिति की धारा थेल्स, पाइथागोरस और यूक्लिड में से होती हुई 17वीं शताब्दी के आरंभ में उस मोड़ पर पहुंची जहां उसको बीजगणितीय और धारणाओं एवं सूत्रों का उपयोग जरूरी हो गया। यह कार्य फ्रांस के महान दार्शनिक एवं गणितज्ञ रैनी देकार्ते ने किया।

सन 1637 में अपनी पुस्तक La Geometric में रैनी देकार्ते ने ज्यामिति पर बीजगणित के प्रयोगों से संबंधित अनेक अद्भुत अध्ययन प्रस्तुत किए हैं। आगे चलकर यही अध्ययन निर्देशांक ज्यामिति के जनक सिद्ध हुए। देकार्ते के अनुसार, किसी बिंदु के आलेखन का अर्थ है चित्र द्वारा उसकी स्थिति बना देना।

वस्तुतः ज्यामिति, आकृतियों एवं वक्रो की विशेषताओं का अध्ययन मात्र है। लगभग 300 BC के आसपास प्रसिद्ध ग्रीक गणितज्ञ यूक्लिड में अपने प्रथम व्यवस्थित प्रयास में axioms पर आधारित यूक्लिडियन ज्यामिति का सूत्रपात किया। लगभग 17 वी शताब्दी के आसपास ऐसी परंपरा थी की जयंती को बीजगणित के साथ संयुक्त रूप में संश्लेषण ज्यामिति से संबंधित समस्याओं को हल करने में प्रयुक्त किया जाता था।

रैनी देकार्ते ने जिन चार अन्य पुस्तकों की रचना की वह है:-

  1. The principles of human knowledge
  2. The principle of material things
  3. The visible world
  4. The earth

देकार्ते ने किसी बिंदु की स्थिति को नियत रेखाओं से दूरी तथा इसकी दिशा के संदर्भ में संबंधित करने का प्रयास किया। ज्यामिति का प्रारंभ ही एक बिंदु तथा सरल रेखा से होता है। विश्लेषणात्मक ज्यामिति में हम बिंदु तथा सरल रेखा को उसके नाम से ही व्याख्या करते हैं।

इनके द्वारा बीजगणित तथा ज्यामिति के क्षेत्र में किए गए कार्य को सर्वदा याद किया जाता रहेगा।

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