भगवतशरण उपाध्याय

भगवतशरण उपाध्याय
पुरातत्वज्ञ, इतिहासवेत्ता, संस्कृति मर्मज्ञ, विचारक, निबंधकार, आलोचक और कथाकार

उनके व्यक्तित्व का मुख्य क्षेत्र इतिहास है, उनके लेखन का मुख्य विषय इतिहास है। उनके सोचने का मुख्य नजरिया ऐतिहासिक है। फिर भी संस्कृति के बारे में उनके दृष्टिकोण और चिन्तन को देखा जाए, वैसे ही साहित्य के बारे में उनके दृष्टिकोण और चिन्तन को देखना भी कम रोचक नहीं है। हिन्दी आलोचना के विकास में अथवा आलोचना-कर्म में उपाध्याय जी की चर्चा आमतौर से नहीं सुनी जाती। हिन्दी-आलोचना पर लिखी पुस्तकों में उनका उल्लेख नहीं मिलता और हिन्दी के आलोचकों की चर्चा के प्रसंग में लेखकगण उनका ज़िक्र नहीं करते। लेकिन डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने साहित्य के प्रश्नों पर, ख़ासकर अपने समय के ख़ास प्रश्नों पर तो विचार किया ही है, उन्होंने बाजाब्ता साहित्य की कृतियों की व्यावहारिक समीक्षा भी की है। यह तो अलग से ध्यान देने योग्य और उल्लेखनीय है कि उन्होंने कालिदास पर जितने विस्तार से लिखा है, उतने विस्तार से और किसी ने नहीं लिखा। कालिदास उनके अत्यंत प्रिय रचनाकार हैं। उन पर डॉ. उपाध्याय ने कई तरह से विचार किया है।

शिक्षा

उपाध्याय जी ने संस्कृत, हिन्दी साहित्य, इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व का गहन अध्ययन किया।

रचनाएँ
  1. विश्व साहित्य की रूपरेखा
  2. कालिदास का भारत
  3. कादम्बरी
  4. ठूँठा आम
  5. लाल चीन
  6. गंगा-गोदावरी
  7. बुद्ध वैभव
  8. साहित्य और कला
  9. सागर की लहरों पर
  10. भारतीय इतिहास के आलोक स्तंभ
अंग्रेज़ी रचनाएँ
    • इंडिया इन कालिदास
    • विमेन इन ऋग्वेद
    • द एंशेण्ट वर्ल्ड
    • फ़ीडर्स ऑफ़ इंडियन कल्चर
 

 

जन्म
1910
जन्म स्थान
उजियारपुर, जिला- बलिया (उ0प्र0)
मृत्यू
12 अगस्त 1982
सम्मान
इन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका का संपादन भी किया। ये हिन्दी विश्वकोश संपादक-मंडल के सदस्य भी रहे। इन्होंने मारीशस में भारत के राजदूत तथा विक्रम विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर पद को भी सुशोभित किया है।