मैथिलीशरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त
मैथिलीशरण गुप्त
मैथिलीशरण गुप्त
कवि, राजनेता, नाटककार, अनुवादक

हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उन्हें साहित्य जगत में ‘दद्दा’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और और इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी भी दी थी। उनकी जयन्ती 3 अगस्त को हर वर्ष ‘कवि दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है।

शिक्षा – दीक्षा

विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत, आदि ने उन्हें विद्यालय में पढ़ाया। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। 12 वर्ष की अवस्था में ब्रजभाषा में कनकलता नाम से कविता रचना आरम्भ किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक “सरस्वती” में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई।

रचनाए
महाकाव्य
  1. साकेत,
  2. यशोधरा
खण्डकाव्य
  1. जयद्रथ वध,
  2. भारत-भारती,
  3. पंचवटी, द्वापर,
  4. सिद्धराज, नहुष,
  5. अंजलि और अर्घ्य,
  6. अजित,
  7. अर्जन और विसर्जन,
  8. काबा और कर्बला,
  9. किसान,
  10. कुणाल गीत,
  11. गुरु तेग बहादुर,
  12. गुरुकुल ,
  13. जय भारत,
  14. युद्ध, झंकार,
  15. पृथ्वीपुत्र,
  16. वक संहार,
  17. शकुंतला,
  18. विश्व वेदना,
  19. राजा प्रजा,
  20. विष्णुप्रिया,
  21. उर्मिला,
  22. लीला,
  23. प्रदक्षिणा,
  24. दिवोदास,
  25. भूमि-भाग
नाटक
  1. रंग में भंग,
  2. राजा-प्रजा,
  3. वन वैभव,
  4. विकट भट,
  5. विरहिणी,
  6. वैतालिक,
  7. शक्ति,
  8. सैरन्ध्री,
  9. स्वदेश संगीत,
  10. हिड़िम्बा,
  11. हिन्दू,
  12. चंद्रहास
काविताओं का संग्रह

उच्छवास

भाषा शैली

मैथिलीशरण गुप्त की काव्य भाषा खड़ी बोली है। 

शैलियों के निर्वाचन में मैथिलीशरण गुप्त ने विविधता दिखाई, किन्तु प्रधानता प्रबन्धात्मक इतिवृत्तमय शैली की है। उनके अधिकांश काव्य इसी शैली में हैं- ‘रंग में भंग’, ‘जयद्रथ वध’, ‘नहुष’, ‘सिद्धराज’, ‘त्रिपथक’, ‘साकेत’ आदि प्रबंध शैली में हैं। यह शैली दो प्रकार की है- ‘खंड काव्यात्मक’ तथा ‘महाकाव्यात्मक’। साकेत महाकाव्य है तथा शेष सभी काव्य खंड काव्य के अंतर्गत आते हैं।

गुप्त जी की एक शैली विवरण शैली भी है। ‘भारत-भारती’ और ‘हिन्दू’ इस शैली में आते हैं। तीसरी शैली ‘गीत शैली’ है। इसमें गुप्त जी ने नाटकीय प्रणाली का अनुगमन किया है। ‘अनघ’ इसका उदाहरण है। आत्मोद्गार प्रणाली गुप्त जी की एक और शैली है, जिसमें ‘द्वापर’ की रचना हुई है। नाटक, गीत, प्रबन्ध, पद्य और गद्य सभी के मिश्रण एक ‘मिश्रित शैली’ है, जिसमें ‘यशोधरा’ की रचना हुई है।

जन्म
3 अगस्त 1886
जन्म स्थान
चिरगाँव, झाँसी, उत्तर प्रदेश
मृत्यू
दिसम्बर 12, 1964
पिता
सेठ रामचरण
माता
श्रीमती काशीबाई
सम्मान
भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण सम्मान