श्रीधर पाठक

जन्म
जन्म स्थान
मृत्यू
पिता
माता
सम्मान
शिक्षा - दीक्षा
पद्य साहित्य में योगदान
गद्य साहित्य में योगदान

वर्तमान हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावादी प्रवत्ती के कवि श्रीधर पाठक का जन्म 1859 में आगरा जिले के जोंधरी ग्राम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था।इनके पिता पंडित लाल धर पाठक एक श्रद्धालु तथा भगवत भक्त ब्राह्मण थे। पिता के धार्मिक विचारों का प्रभाव बालक श्रीधर पर पड़ा था। श्रीधर पाठक के आरंभिक शिक्षा पारंगत संस्कृत से शुरू हुई।

1879 ईस्वी में आगरा कॉलेज में अंग्रेजी मिडिल तथा 1881 ईसवी में कोलकाता विश्वविद्यालय से एंट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण की।अपने स्वाध्याय से पाठक जी ने संस्कृत, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।हाई स्कूल की परीक्षा पास करके श्रीधर पाठक कोलकाता आ गए, वहां कमिश्नर के कार्यालय में और फिर गवर्नर के कार्यालय में नौकरी करने लगे।

उसके कुछ समय बाद श्रीधर पाठक दिल्ली में भारत सरकार के कार्यालय में डिप्टी सुपरिटेंडेंट तथा सुपरिटेंडेंट के पद पर कार्य करते रहे।सन 1914 ईस्वी को सेवा से अवकाश ग्रहण करके पाठक जी प्रयाग आ गए वहां लूकरगंज मोहल्ले में उन्होंने पदम कोट नाम का बंगला बनवाकर जीवन का अंतिम समय बिताया। श्रीधर पाठक की रचनाओं को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

मौलिक रचना– मनोविनोद, जगत, सच्चाई सार, बनाअष्टक, कश्मीर-सुषमा, देहरादून, गोखले, गुनाअष्टक, गोपीका गीत, भारत गीत।

अनूदित रचना– एकांतवासी योगी, उजाड़ ग्राम, शांत पथिक, ऋतुसंहार।अंग्रेजी स्वच्छंदतावाद कवि गोल्ड स्मिथ के ट्रैवलर नाम कृति का शांत पथिक शीर्षक से अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त लांगफेलो एवं पार्नेल की कृतियां का अनुवाद किया।हिंदी में आलंबन रूप में प्रकृति वर्णन की परंपरा का श्रेय श्रीधर पाठक जी को है।

श्री पाठक का झुकाव गोल्डस्मिथ एवं कालिदास की कविता की ओर अधिक रहा है। 18 वीं शताब्दी के साहित्य में पाठक जी का विशिष्ट स्थान था। इसके अतिरिक्त नागरिक जीवन की कृत्रिमता के स्थान पर ग्राम्य जीवन की नैसर्गिक को उन्होंने महत्त्व दिया।

  • श्रीधर पाठक का जन्म सन 18 सो 59 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के अंतर्गत जौधरी ग्राम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
  • इनके पिता श्री लीलाधर पाठक कर्मकांड पंडित थे।
  • इनके परदादा कुश्लेष जी हिंदी के अच्छे कवि थे।
  • श्रीधर पाठक जी की आरंभिक शिक्षा परंपरागत संस्कृत से शुरू हुई।
  • मिडिल, हाई स्कूल की परीक्षाएं पाठक जी ने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।
  • श्रीधर पाठक जी भारत सरकार के कार्यालय में डिप्टी सुपरिटेंडेंट तथा सुपरिटेंडेंट के पदों पर नियुक्ति थे।
  • पाठक जी का साहित्य के प्रति बड़ा अनुराग था।
  • नौकरी के प्रसंग में इन्हें कश्मीर और नैनीताल भी जाना पड़ा था।
  • अंग्रेजी के स्वच्छंदतावादी कवि गोल्ड स्मिथ हरमीट के आधार पर एकांतवासी योगी नाम से लावनी छंद में अनुवाद किया।
  • आलंबन रूप में प्रकृति वर्णन के परंपरा का श्रेय श्रीधर पाठक जी को है।
  • पाठक जी ने प्रकृति के सौंदर्य को बड़ी बारीकी से अपने काव्य में स्थापित किया है।
  • श्रीधर पाठक का झुकाव गोल्ड स्मिथ एवं कालिदास की कविताओं की और अधिक रहा है।
  • काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली को रचनात्मक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय श्रीधर पाठक जी को है।
  • छंद पद-विन्यास आदि में पाठक जी ने नवीनता लाने का प्रयास किया है।

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